नई दिल्ली, 30 सितंबर 2025 — अमेरिकी डॉलर में इस साल अब तक 10% की गिरावट दर्ज की गई है, जो 2017 के बाद सबसे बड़ी गिरावट है। इस बदलाव ने वैश्विक बाजारों में हलचल पैदा कर दी है और भारत की मुद्रा, रुपया (INR), भी दबाव में है।
डॉलर गिरने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी डॉलर की गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण हैं:
- कमजोर आर्थिक आंकड़े — अमेरिका में रोजगार डेटा अपेक्षाकृत कमजोर रहा और बेरोजगारी दर में वृद्धि हुई।
- ब्याज दर में कटौती — फेडरल रिज़र्व ने इस वर्ष ब्याज दर में 25 आधार अंकों की कटौती की है और भविष्य में और कटौतियों का संकेत दिया है।
- राष्ट्रीय ऋण में वृद्धि — अमेरिका का ऋण-से-जीडीपी अनुपात 130% तक पहुँच गया है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा कम हुआ है।
- राजनीतिक अनिश्चितता — नई टैरिफ नीतियों और बजट प्रस्तावों ने निवेशकों में असमंजस पैदा किया है।
इन कारकों के परिणामस्वरूप डॉलर की मांग में कमी आई है और निवेशक सुरक्षित विकल्पों की तलाश में हैं।
भारतीय रुपया पर असर
अमेरिकी डॉलर की कमजोरी का असर भारतीय रुपया पर भी दिखाई दे रहा है। 30 सितंबर 2025 को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 88.80 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पिछले छह कारोबारी सत्रों में भारतीय शेयर बाजार से 2 अरब डॉलर से अधिक की निकासी की है।
त्योहारों के मौसम में आयातकों की डॉलर की मांग भी रुपया पर दबाव बढ़ा रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने इस स्थिति को संभालने के लिए बाजार में डॉलर की बिक्री की है, लेकिन मौजूदा अस्थिरता बनी हुई है।
निवेशकों के लिए सुझाव
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इस तरह की अस्थिरता के समय निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए:
- निवेश पोर्टफोलियो का विविधीकरण करें।
- सुरक्षित निवेश विकल्प जैसे सोना पर विचार करें।
- बाजार की स्थितियों की नियमित निगरानी करें और रणनीति बदलें।
यदि अमेरिकी डॉलर की गिरावट का रुझान जारी रहता है, तो यह भारतीय मुद्रा और वित्तीय बाजार पर और भी गहरा असर डाल सकता है। निवेशकों के लिए यह समय जोखिम प्रबंधन और सावधानी से काम लेने का है।

