नई दिल्ली: विश्व के सबसे बड़े निवेशक और वित्तीय विशेषज्ञ वॉरेन बफेट ने भारत में बढ़ती “EMI संस्कृति” को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। उनका कहना है कि भारत का नया उपभोक्ता वर्ग, खासकर युवा, “Buy Now, Pay Later” और “नो-कॉस्ट EMI” जैसे ऑफर्स से आकर्षित होकर अपनी वास्तविक आय से ज़्यादा खर्च करने लगा है। यह चलन अल्पकालिक खुशी तो देता है, लेकिन लंबी अवधि में यह भारी वित्तीय बोझ और कर्ज़ की आदत में बदल सकता है।
EMI संस्कृति का बढ़ता चलन
भारत में स्मार्टफोन, गैजेट्स, घरेलू उपकरण, यहां तक कि छुट्टियाँ और ऑनलाइन शॉपिंग भी अब आसानी से EMI विकल्पों के साथ उपलब्ध हैं। बैंक और ई-कॉमर्स कंपनियाँ इसे “सुलभ” और “नो-कॉस्ट” बताकर प्रमोट करती हैं।
- 70% iPhone खरीदार EMI पर: रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में iPhone लेने वाले लगभग 70% उपभोक्ता EMI के ज़रिए भुगतान करते हैं।
- छोटे आय वर्ग पर दबाव: जिन लोगों की मासिक आय ₹50,000 से कम है, उनमें से लगभग 90% लोग अपने रोज़मर्रा के खर्च भी EMI या क्रेडिट कार्ड पर पूरा करते हैं।
- त्योहारों में उछाल: दिवाली, ईद और क्रिसमस जैसे अवसरों पर EMI आधारित बिक्री कई गुना बढ़ जाती है।
वॉरेन बफेट की चेतावनी
बफेट का मानना है कि जब उपभोक्ता बार-बार EMI और क्रेडिट कार्ड का सहारा लेते हैं, तो वे “कर्ज़ पर जीने की आदत” विकसित कर लेते हैं।
“EMI आपको आज कुछ दिला सकती है, लेकिन उसका भुगतान आपके आने वाले कल की आज़ादी छीन सकता है।” – वॉरेन बफेट
EMI और ब्याज का जाल
- भारत में क्रेडिट कार्ड की ब्याज दर 36% से 40% तक पहुँच सकती है।
- “नो-कॉस्ट EMI” अक्सर छिपे हुए चार्ज और प्रोसेसिंग फीस के साथ आती है।
- अगर एक-दो भुगतान लेट हो जाएँ, तो पेनल्टी और ब्याज मिलकर बोझ कई गुना बढ़ा देते हैं।
क्यों खासकर युवाओं को है खतरा?
- आकर्षक जीवनशैली का दबाव – नए गैजेट्स, ब्रांडेड कपड़े, यात्राएँ और सोशल मीडिया ट्रेंड्स युवा वर्ग को तुरंत खर्च के लिए प्रेरित करते हैं।
- कम वित्तीय शिक्षा – स्कूल-कॉलेज में वित्तीय अनुशासन की ट्रेनिंग नहीं दी जाती, जिससे EMI और ब्याज का असर कई बार समझ से बाहर रह जाता है।
- बचत की आदत कम – पहले की पीढ़ियाँ बचत पर ज़ोर देती थीं, आज की युवा पीढ़ी “पहले खर्च, बाद में सोचना” वाली सोच अपनाती है।
बफेट की सलाह: कैसे बचें EMI के जाल से?
- पहले बचत करें, फिर खर्च
अपनी मासिक आय का कम से कम 20-30% बचत या निवेश में लगाएँ, बाकी से खर्च करें। - आपातकालीन कोष बनाएँ
कम से कम 6 महीने का खर्च बचाकर रखें। इससे अचानक नौकरी जाने या बीमारी जैसी स्थिति में EMI का दबाव नहीं पड़ेगा। - क्रेडिट का उपयोग समझदारी से करें
क्रेडिट कार्ड तभी इस्तेमाल करें जब आपको भरोसा हो कि आप समय पर पूरा भुगतान कर देंगे। - लालच से बचें
हर ऑफर या “नो-कॉस्ट EMI” का मतलब सस्ता होना नहीं होता। सोचें कि क्या वाकई वह खरीद ज़रूरी है। - चक्रवृद्धि ब्याज को अपने पक्ष में करें
EMI और ब्याज आपको कर्ज़ में डुबा सकते हैं, लेकिन SIP, FD या स्टॉक्स में नियमित निवेश से यही चक्रवृद्धि आपके पैसे को कई गुना बढ़ा सकती है।
भारत की “EMI जनरेशन” का भविष्य
- अगर यह प्रवृत्ति अनियंत्रित रही, तो आने वाले समय में भारत के मध्यमवर्गीय परिवारों पर ऋण बोझ और वित्तीय असुरक्षा बढ़ सकती है।
- क्रेडिट स्कोर बिगड़ने से भविष्य में घर, गाड़ी या बिज़नेस लोन लेने में मुश्किल होगी।
- दूसरी ओर, अगर वित्तीय अनुशासन अपनाया जाए तो EMI के बजाय निवेश की आदत भारत को एक सशक्त बचत और निवेश आधारित अर्थव्यवस्था में बदल सकती है।
निष्कर्ष
भारत में EMI संस्कृति ने उपभोक्ताओं को चीज़ें आसान बना दी हैं, लेकिन यही आसानी एक “कर्ज़ का जाल” भी बन रही है। वॉरेन बफेट की यह चेतावनी केवल निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि हर उस भारतीय के लिए है जो हर महीने EMI चुका रहा है।

