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भारत में खुदरा महंगाई 2017 के बाद सबसे निचले स्तर पर — जानिए क्यों घटा महंगाई का दबाव

भारत की खुदरा महंगाई दर (Retail Inflation) सितंबर 2025 में घटकर 1.54% पर पहुंच गई है, जो कि जून 2017 के बाद का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए एक अप्रत्याशित लेकिन राहत भरी खबर मानी जा रही है। अगस्त में महंगाई दर 2.07% थी, जिससे यह साफ है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में तेजी से गिरावट आई है।

यह कमी मुख्यतः खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट, अनुकूल आधार प्रभाव (favourable base effect) और सरकारी नीतिगत हस्तक्षेपों का परिणाम है।


खाद्य महंगाई में तीव्र गिरावट

महंगाई घटने का सबसे बड़ा कारण रहा खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी कमी। सितंबर महीने में सब्जियों, दालों और अनाज की कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

  • सब्जियों की कीमतों में वर्ष-दर-वर्ष करीब 21% की गिरावट आई है।
  • दालों और अनाज की कीमतें भी 15% तक सस्ती हुई हैं।
  • खाद्य और पेय पदार्थों की श्रेणी में कुल मिलाकर नकारात्मक मुद्रास्फीति (deflation) देखने को मिली, जो लगातार चौथे महीने जारी रही।

कृषि उत्पादों की भरपूर आपूर्ति, बेहतर मानसून और सरकारी भंडारण नीति ने खाद्य कीमतों को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभाई।


आधार प्रभाव का असर

एक और प्रमुख कारण रहा आधार प्रभाव। पिछले वर्ष इसी अवधि में महंगाई दर अपेक्षाकृत अधिक थी। इसलिए उसी ऊँचे आधार पर तुलना करने पर इस वर्ष की गिरावट और स्पष्ट दिखाई दे रही है। सांख्यिकीय रूप से यह प्रभाव सितंबर के आंकड़ों को और नीचे खींचता है।


ऊर्जा और ईंधन की स्थिति

सितंबर में ईंधन और बिजली (Fuel & Light) श्रेणी में भी कीमतों में नरमी रही। वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहने से घरेलू पेट्रोल और डीजल की दरों पर दबाव नहीं बढ़ा। ऊर्जा महंगाई 2% से नीचे रही, जो पिछले कुछ महीनों में पहली बार हुआ है।


सोना और आवास महंगाई में हल्की बढ़ोतरी

जहां खाद्य और ईंधन की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, वहीं कीमती धातुओं (विशेषकर सोना) और आवास किरायों में हल्की बढ़ोतरी देखने को मिली। निवेशकों ने सोने को सुरक्षित विकल्प के रूप में अपनाया, जिससे इसकी कीमतें बढ़ीं। आवास महंगाई करीब 4% के आसपास रही, जो शहरी क्षेत्रों में रहने की लागत को कुछ हद तक प्रभावित कर रही है।


कोर महंगाई (Core Inflation) की स्थिरता

कोर महंगाई, जिसमें खाद्य और ईंधन को शामिल नहीं किया जाता, लगभग स्थिर रही। यह संकेत देती है कि उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की मूल कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। इसका अर्थ है कि मांग का स्तर सामान्य बना हुआ है और अर्थव्यवस्था में अत्यधिक मंदी या अत्यधिक गर्माहट—दोनों से फिलहाल बचाव है।


नीति निर्माताओं के लिए राहत की खबर

यह गिरावट भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के लिए एक राहत का संकेत है। RBI का महंगाई लक्ष्य 2% से 6% के बीच रहता है। सितंबर का 1.54% का स्तर इस लक्ष्य सीमा के निचले छोर से भी नीचे चला गया है, जिससे अब मौद्रिक नीति में ढील की संभावना बढ़ गई है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहता है, तो RBI दिसंबर 2025 की मौद्रिक नीति समीक्षा में ब्याज दरों में 25 आधार अंकों (bps) की कटौती कर सकता है। इसका उद्देश्य उपभोग और निवेश को बढ़ावा देना होगा।

हालांकि, केंद्रीय बैंक सावधानी बरत सकता है क्योंकि अत्यधिक गिरती महंगाई कभी-कभी आर्थिक सुस्ती का संकेत भी बन सकती है। यदि मांग कमजोर पड़ती है और कीमतें लगातार गिरती हैं, तो यह deflationary pressure पैदा कर सकता है, जो दीर्घकाल में नुकसानदायक साबित हो सकता है।


GST दरों और कर सुधारों का योगदान

सितंबर में वस्तु एवं सेवा कर (GST) की दरों में कुछ आवश्यक वस्तुओं पर कटौती की गई थी। हालांकि इसका पूरा प्रभाव अक्टूबर की महंगाई रिपोर्ट में देखने को मिलेगा, परंतु प्रारंभिक आंकड़ों से स्पष्ट है कि कर राहत ने भी महंगाई को नीचे लाने में योगदान दिया है।


ग्रामीण और शहरी रुझान

ग्रामीण भारत में महंगाई में गिरावट शहरी क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा रही। इसका मुख्य कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि उत्पादन का सीधा प्रभाव है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में औसतन 3% तक की गिरावट दर्ज की गई।
  • शहरी क्षेत्रों में आवास और परिवहन लागत ने कीमतों को थोड़ा ऊपर रखा, लेकिन कुल मिलाकर यहां भी CPI घटा।

उपभोक्ताओं के लिए राहत, लेकिन कंपनियों के लिए चुनौती

आम उपभोक्ता के लिए यह गिरावट राहत भरी खबर है। जरूरी वस्तुओं की कीमतें कम होने से घरेलू बजट पर बोझ घटा है।
हालांकि, विनिर्माण और खुदरा क्षेत्र की कंपनियों के लिए यह स्थिति थोड़ी चुनौतीपूर्ण हो सकती है। कम कीमतें मतलब लाभांश पर असर और उत्पादन लागत में संतुलन की जरूरत।


आगे क्या?

अर्थशास्त्री मानते हैं कि अक्टूबर और नवंबर में महंगाई का स्तर 1% से 2% के बीच रह सकता है। त्योहारों के मौसम में मांग में बढ़ोतरी के बावजूद पर्याप्त आपूर्ति और स्थिर ईंधन कीमतें कीमतों को नियंत्रित रख सकती हैं।

यदि यह स्थिति अगले कुछ महीनों तक बनी रहती है, तो भारत न केवल अपने महंगाई लक्ष्य को प्राप्त करेगा बल्कि मध्यम अवधि में स्थिर मूल्य-वृद्धि और मजबूत आर्थिक वृद्धि की ओर अग्रसर हो सकता है।


निष्कर्ष

भारत में खुदरा महंगाई का 2017 के बाद सबसे निचले स्तर पर आना एक ऐतिहासिक आर्थिक संकेत है। यह दर्शाता है कि सरकार की आपूर्ति श्रृंखला सुधार, फसल उत्पादन वृद्धि और मौद्रिक नीति का संतुलन — तीनों ने मिलकर अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता लाने में सफलता पाई है।

अब सभी की निगाहें अक्टूबर और दिसंबर की रिपोर्टों पर होंगी — क्या यह राहत कायम रहेगी या वैश्विक बाज़ारों की अनिश्चितता से फिर दबाव बढ़ेगा, यह आने वाले महीनों में तय होगा।

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