रणनीतिकार ब्राह्मा चेल्लानी ने आलोचनात्मक टिप्पणी की है कि मिस्र के शार्म अल-शेख़ में आयोजित ग़ाज़ा शांति सम्मेलन (Gaza Peace Summit) मूल विषयों पर चर्चा से अधिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक प्रदर्शन-अवसर था। चेल्लानी ने यह भी कहा कि भारत ने अपनी प्रतिनिधित्व को सीमित करके — यानी एक उप विदेश मंत्री को भेजकर — एक व्यवहारिक और विवेकपूर्ण निर्णय लिया।
चेल्लानी ने कहा कि सम्मेलन को वास्तव में ग़ाज़ा की भविष्य की स्थिति या फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों पर गंभीर रूप से विचार करने की दिशा में नहीं बल्कि ट्रंप को एक मंच देने के इरादे से आयोजित किया गया था। इस प्रकाश में, भारत ने पठनीय निर्णय लेते हुए उच्च स्तर की भागीदारी से पीछे हटने का निर्णय किया। उन्होंने यह तर्क दिया कि सम्मेलन में लगभग 24 देशों के मुखिया उपस्थित थे, लेकिन भारत ने अपना प्रतिनिधित्व घटी स्थिति में रखा।
चेल्लानी के अनुसार, यह सम्मेलन “ट्रंप का विजयप्रदर्शन” (victory lap) था — जिसका उद्देश्य दूरगामी समाधान पर काम करना नहीं बल्कि प्रतीकात्मक रूप से सफलता दिखाना था। उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने अपनी बहुमत देशीय और वैश्विक हितों को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया कि इस स्तर की भागीदारी परिस्थितियों के अनुकूल नहीं थी।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि
- यह शांति सम्मेलन 13 अक्टूबर 2025 को शार्म अल-शेख़ (مصر) में आयोजित किया गया, और इसे संयुक्त रूप से मिस्र और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों ने सह-अध्यक्षता दी।
- इसमें लगभग तीस देशों के प्रतिनिधि शामिल थे, लेकिन इज़राइल और हमास के प्रतिनिधियों की उपस्थिति नहीं थी।
- इस बैठक का उद्देश्य ग़ाज़ा युद्ध को समाप्त करने तथा पुनर्निर्माण योजनाओं पर आगे की रूपरेखा तैयार करना था।
चेल्लानी की इस टिप्पणी का राजनीतिक एवं कूटनीतिक महत्व
चेल्लानी की टिप्पणी इस दृष्टिकोण को मजबूत करती है कि भारत ने शांति प्रक्रिया के प्रतीकात्मक मंच से दूर रहकर अधिक व्यावहारिक और सतर्क नीति अपनाई है। यह निर्णय — सम्मेलन में प्रधानमंत्री स्तर की उपस्थिति न देने का — इस गठबंधन और वैश्विक परिदृश्यों की जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया माना जा रहा है।
इस बीच, कुछ पूर्व विदेश सचिवों ने भी भारत के इस निर्णय का समर्थन किया। उदाहरण के लिए कनवल सिब्बल ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री मोदी सम्मेलन में जाते और ट्रंप से मुलाकात करनी पड़ती, तो यह समयपूर्व और असमय निर्णय हो सकता था।
इस पूरे समीकरण में यह दृष्टिकोण उभर कर आता है कि भारत ने अपने कूटनीतिक मूल्यांकन की प्रक्रिया में संतुलन और विवेक को प्राथमिकता दी, बजाय कि किसी प्रतीकात्मक ग्लानिक प्रदर्शन में शामिल होने के।

